जान तो गई हूं अब
इतना मैं
यहां रहते-रहते
रावण से इतनी बार मिलकर
समझ चुकी हूं मैं कि
मेरी इच्छा के विरुद्ध
रावण मुझे हाथ तक न लगाएगा।
फिर अंततः
है उसका उद्देश्य क्या?
क्या मेरी तरह वो भी
है प्रतीक्षा में राम की?
क्या वो करना चाहता है पराजित
राम को लंका की भूमि पर?
उसके उपरांत क्या
बदल जाएगा वो,
वास्तविक
कुरूप स्वरूप
तब अपना
दिखलाएगा।
कहती है त्रिजटा,
रावण करता है
मंदोदरी का बड़ा सम्मान,
मानता है उसकी हर सलाह,
पर मेरे बारे में
उसने ठुकरा दी है
मंदोदरी की भी मंत्रणा।
क्या देना चाहता है वह मुझे
मानसिक यंत्रणा,
या तोड़ना चाहता है
वह राम के प्रति मेरा अनन्य प्रेम,
मेरा धैर्य, मेरी आस
मेरा अटूट विश्वास?
कभी-कभी
बैठे-बैठे यूं ही
सोचती हूं मैं,
क्यों इन नृपों के युद्ध में
नारियां
पासों की तरह प्रयोग होती है।
क्यों उनकी देह को रौंदना,
उन्हें अपने रनिवास में
सम्मिलित करना,
किसी विजयी शासक को
प्रतीत होता है
अपने शत्रु का दर्प तोड़ना।
क्यों किसी युद्ध में
पराजित भूपति की रानियां,
उस नगर की स्त्रियां,
समझी जाती हैं
विजय में जीती हुई वस्तु कोई।
क्यों उनकी देह के साथ
होता है खिलवाड़?
कभी-कभी मेरे मन में
उठता है यह प्रश्न भी,
क्या आवश्यकता थी
लखन को
शूर्पणखा की नाक को
भंग करने की।
वो मात्र
प्रणय निवेदन ही तो
कर रही थी।
माना
वह हो गई थी
अति उत्श्रृंखल,
अपने इस प्रयास में,
पर लक्ष्मण भी तो
श्रीराम की भांति
विनम्रता से उसका
अनुरोध ठुकरा सकते थे।
ये कृत्य लखन का
अक्षम्य है।
सुना मैंने,
हंसे भी तो
वो थे अपने इस कृत्य पर।
राम की उपस्थिति में,
लक्ष्मण का एक स्त्री के प्रति
ऐसा निर्मम व्यवहार
जो अशोभनीय और निंदनीय था।
कौन भ्राता भला सह पाएगा?
वो भी रावण जैसा ,
हैं जिसके अधीन
नव ग्रह, कितने देव
कितने निशाचर।
अपनी मुंहबोली बहन के साथ
इस तरह का दुर्व्यवहार
रावण जैसा महाबली अधिपति
यदि चुपचाप सहेगा
तो जग उस पर हंसेगा।
इस घटना के उपरांत भी
यदि उसने
कुछ भी न किया होता
तो उससे भय कौन करेगा।
सुना मैंने
भरी सभा में रोती हुई
शूर्पणखा की व्यथा को सुनकर
उसने की थी प्रतिज्ञा,कि वो
कर देगा राम-लक्ष्मण के
दर्प का दहन।
मैं तो जैसे
एक मोहरा मात्र हूं,
वास्तविक उद्देश्य उसका है
तोड़ना अभिमान,
राम और लक्ष्मण का।
दो ही विकल्प हैं इसके,
या मेरा स्वेच्छा से
उसकी अंकशायिनी बन जाना,
या उसका
राम को युद्ध में पराजित करना।
मेरे बलात भोग से,
भला कैसे पूरा होगा
उसका प्रतिशोध,
कैसे टूटेगा राम का अभिमान?
क्या ऐसा तो नहीं कि
अब तक भूल नहीं पाया,
मेरे स्वयंवर में
शिव धनुष को
उठा न पाने की पीड़ा रावण,
और इस घटना से
मिल गया उसे अपनी
कुत्सित कामना की पूर्ति
और अपमान का बदला लेने का
एक सरल अवसर।
जानते हैं सब
और कहेंगे भी यही,
सीता को बलपूर्वक
अपना बना लेना
तो कार्य था सहज
सरल उसके लिए
जिसके सम्मुख देव दानव
सब हैं शीश झुकाते।
वो जो है धरती पर
सबसे बलवान
अपहृत कर
एक विवाहिता स्त्री को
उसकी इच्छा के विरुद्ध
यदि अपनी अंकशायिनी
बना भी लिया तो
इसमें कौन सा कार्य महान?
मुझे लगता है कि
रावण है नीतिवान,
उसमें शेष है अब भी
नीति का ज्ञान।
भलीभांति जानता है वह कि
मुझको बलपूर्वक अपनाने से,
कभी न पूरा होगा
उसका प्रतिशोध।
या तो उसे मिले
स्वेच्छा से मेरा समर्पण
जिसका कर सके वह
समस्त जग में गर्व से प्रदर्शन।
या राम-लक्ष्मण आएं
मुझे ढूंढते-ढूंढते
उसकी इस स्वर्ण लंका में
और उन्हें पराजित कर बना बन्दी
लाए उनको मेरे समक्ष
और तोड़े वो अभिमान हम सबका।
रावण ऐसा
मूर्ख नहीं है कि
अपने चरित्र पर
लगने दे कलंक।
मुझे हरने का दोष तो वो
शूर्पणखा के साथ
दुर्व्यवहार से उपजे
तात्कालिक क्रोध पर डालकर
वह इस कृत्य को
ठहरा सकता है तर्कसंगत।
पर बलपूर्वक मुझे अपनाने को
वह न्याय संगत
कभी न ठहरा पाएगा।
युद्ध में राम को
हराने के पश्चात,
मेरे साथ कर सकता है
वो कोई भी व्यवहार।
फिर सब प्रहरिनियां
बतलाती हैं कि,
अपनी रानी मंदोदरी से
रावण करता है
अत्यंत प्रेम
और उसके प्यार को
किसी और से
संभवतः वह
कभी बांट ना पायेगा।
मेरे हर बार
उसे ठुकराने से
उसके छल-बल या
कहो उसके
ऐश्वर्य के प्रदर्शन से भी,
मेरे कभी न घबराने से,
न टूटने से, न झुकने से,
लगती है
उसके अहंकार को
एक नई चोट
एक नई ठेस।
बढ़ता जाता है
उसका त्रास
इस तिरस्कार से।
एक कृशकाय नारी से
जो बंदिनी है,
जग के सर्वाधिक बलशाली
राजा के अपने राज्य में ही,
इस तरह के साहस की अपेक्षा,
और अपनी अनवरत उपेक्षा की,
आशा संभवत:
उसने कभी भी न की होगी।
क्रोध और अपमान की
ज्वाला में
अब वह
दिन रात जलता है।
त्रिजटा ने एक दिन मुझे
बताया था कि,
रावण को सब पता है कि
ढूंढ रहे हैं राम मुझे चतुर्दिक,
और आज नहीं तो कल
उन्हें मेरा पता जाएगा चल।
त्रिजटा ने यह भी बताया था कि
जब दरबार में,
एक गुप्तचर ने
एक दिन ,
यह समाचार सुनाया था कि
राम वनवासियों और बंदरों की
एक सेना भी
एकत्र कर रहे हैं,
रावण से युद्ध को,
तो कितना
अट्टहास किया था
उसने भरे दरबार में
राम और लक्ष्मण की
कितनी खिल्ली उड़ाई थी,
उसने और
उनके इस
बाल्य सुलभ
स्वप्न की
कि वो वनवासियों और
वानरों की सेना के साथ,
अपार सिंधु को लांघ,
उससे उसकी अपनी लंका में
युद्ध कर,
उसे पराजित करने की
कल्पना भी कर सकते हैं।