कुछ रिश्ते बिखर जाते हैंं

बंधनों के दबाव से

मत बांधों किसी बंधन में

अगर सहेज कर रखना है अपरिचित संबंधों को


ठीक वैसे ही जैसे कभी

किसी पुष्प को भींचों जोर से अपनी मुठ्ठी मेंं

तो बिखर जाती हैं सारी पंखुड़ियां  

फिर पुष्प कहांं जुड़ पाता है

कई बार हाथों से छिटक जाती हैं

फिर टूटा ही हाथ आता है

कुछ ऐसा जो टूटे इक बार फिर

जुड़ कहां पाता है

थोड़ा अधिकार जताना फिर भी ठीक

थोड़ा ही अपनत्व दिखाना फिर भी ठीक

पर मुक्त रखना ज्यादा अच्छा