सागर के मध्य में जहाज के डेक से रहा हूं सागर को निहार
कितना असीम कितना अनंत कितना अद्भुत विस्तार
दृष्टि की सीमाएं तक हो रही हैं समाप्त
पर होता नहीं दृष्टि गोचर सागर का कोई अंत
सागर है अपरम्पार ,सागर के गर्भ मे छिपे हैं
कितने ही रत्न कितने खनिजों के असीमित भंडार
सागर की अतल गहराइयों में है छुपे हैं कितने ही
जीव,जंतु वनस्पतियों का अद्भुत अनोखा संसार
सूर्य की प्रखर दीप्त किरणों से हो आलोकित
देखते ही बनता है सुनहरे सागर का निखार
सागर के हृदय मे कितनी लहरें, छुपे हैं कितने ही तूफान
सागर के गर्भ से आती है सुनामी,होता है भूकम्प का उभार
सागर कितना धीर गंभीर कितना गहरा और कितना शांत
क्रोधित सागर से उठे तूफान भू पर भी मचा देते हाहाकार
कितने सागरों ,महासागरों में जल भरा कितना अथाह
फिर भी नहीं हम जल समस्या से पाते नहीं क्यों पार
अपने कचरों कूड़ों से हम भर रहे हैं सागरों का भी सीना
भूलें न ये सत्य संसार समाप्त होता है जल प्रलय से हर बार

