इंसानी जिस्मों के पिंजरे में कैद कितनी रुहें
छटपटाती हुई मुक्ति के लिये
कितने सैयाद हर कदम पर बैठे लगाकर घात
कितनी पाबंदियां, कितने पहरे
जिस्मों से जुदा और भी न जाने
सैयादों के हाथों मेंं कितने ही पिंजरे
हर पिंजरे की कोई अलग सी
इक बेबुनियाद कहानी
परिंदे हैं अक्सर पिंजरे में सहलाये जाते, दुलराये जाते
ये अलग बात है कई बार उन पिंजरों में ही
नोंच लिये जाते हैं उनके पंख
छिन जाते हैं उनकी आंखों के ख्वाब
पर सबको ही बताया जाता है अक्सर
महफूज़ हो तब तक ,जब तक हो इस पिंजरे में पिंजरे के बाहर की दुनिया डरावनी है
घूमते रहते हैं कितने ही बाज और गिद्ध
तुम्हारे शिकार के लिए जो नोचना चाहते हैं
सिर्फ तुम्हारा पर तुम्हारा जिस्म ही नहीं
तुम्हारा ख्वाब, तुम्हारी रुह तक
जब रहोगी तुम जिंदा लड़नी ही पड़ेंगी
तुम्हें जिंदगी के हर कदम पे ये लडा़ई
औरत का जिस्म लेके जन्मी हो तुम
आसानी से कहां मिलेगी ..
तुम्हारे जिस्म तुम्हारी रुह को रिहाई