अपने टाट पैबंद लगे खुरदुरे से इस जीवन में
अब भी मैं रेशम के कुछ मखमली ख्वाब सजाता हूं।
कभी तुम मुझसे कुछ कह देती हो चुपके से आकर कभी कुछ चुपके से मैं तुमको कहकर जाता हूंं।
अपने टूटे स्वर में ही सही पर मैं आज भी,
मैं अब भी कुछ उदास बिखरे गीत गाता हूं।
शब्दों में ही तुम्हारी छवि उकेरता रहता हूं
कभी उसे बनाता कभी उसे स्वयं मिटाता हूं ।
मेरा तुम तक आना है कठिन,तुम्हारा मुझ तक आना मुश्किल,इसलिए तुमसे बस सपनों में ही मिल पाता हूं।
अपने सारे गीतों में मैं अब बस तुमको ही हूं रचता
बस तुम्हें ही पुकारता, तुम्हें बुलाता रहता हूं।
मात्र आकर्षण है,प्रेम हैकोई अपराध है या कुछ और है
इन उमड़ी भावनाओं के अबूझ अर्थ समझ न पाता हूं।