अब कोई यहां 
रास्ता इस तरह नहीं बताता
जैसे मां बताती थी की 
चौक पर चले जाना
वहां देवी जी के मंदिर से आगे 
बाएं मुड़ जाना
वहां महावीर हलवाई की दुकान है
उससे आगे चलोगे तो 
शंकर जी की मूर्ति वाले तिराहे पर 
दायें मुड़ जाना 
फिर बायें तरफ साड़ी महल आयेगा 
उससे अगली गली में बायें मुड़ जाना
वहां एक तिमंजिला सफेद मकान है 
उसी के बग़ल में 
कमल टेलर्स की दुकान हैं,
वहीं से मेरे कपड़े लाना है।

तब रास्ते पर 
रहता था सारा ध्यान 
पर अब नहीं रहता
 रास्ते पर ज़रा सा भी ध्यान
रास्ते के इर्द-गिर्द क्या है
 अब तो पता भी नहीं चलता।

अब तो गूगल मैप लगाते हैं,
 वही रास्ते बताता है
अब तो बस कहां मुड़ना है
कौन से सर्किल पर मुड़ना है
कौन सा एक्जिट लेना है 
बस इसी पर लगे रहते हैं कान।

हर दुकान,हर गली हर मकान 
अपने शहर का जैसे रहता था याद
हर रास्ता अपना सा 
बिल्कुल जाना पहचाना लगता था,
कोई अजनबीपन नहीं।

कभी कोई पता नहीं भी जानते थे 
तो कोई न कोई
अनजान ,अजनबी भी
 रास्ता पूरे विस्तार से बता देता था।

कई बार तो 
अगर थोड़ी दूर पर होता था पता 
तो खुद पहुंचा भी आता था।

अब रास्तों को
 जानकर ,पहचानकर ,भटककर 
पता पूछते हुए
गंतव्य तक पहुंचने का सुख 
जैसे कहीं खो गया है।

अब रास्तों से ज़्यादा 
मंजिलों पर ध्यान होता है 
होती है बस
पहुंचने की हड़बड़ाहट ।

जैसे मां रास्ता बताती थी 
वैसे अब कोई रास्ता नहीं बताता
वैसे कोई रास्ता नहीं समझाता।