ऐसा कुछ भी नहीं है

मेरे पास कहने को अपने पिता के लिए

जिन्हें हम बाबूजी कहते थे

वो एक साधारण से व्यक्तित्व वाले

आम इंसान थे

जो जीवन भर जूझते रहे

अपनी आशंकाओं से, चिंताओं से

लोगों के पूर्वाग्रहों से, अपने हठी आग्रहों से

एक अदम्य जुझारूपन था उनके भीतर

जीवन की हर कठिनाई से जूझने का

छिपाकर अपना हर दुःख

वो रखते थे अपने ही भीतर

बचाकर रखते थे वो

अपने प्रियजनों को अपने दुःख से

कई बार लगता था हमको

वो घुटते ही रहते थे अंदर ही अंदर

पर इतना सब कुछ होते हुए भी

उन्होंने नहीं खोई अपनी संवेदना,

नहीं चाहा कभी किसी का बुरा

ऐसे ही तो होते हैं

एक सामान्य घर के सामान्य पिता