दुर्गम थे पथ उनके पर दुर्जेय नहीं पर वो लड़ने से पहले ही हारे हैं और किसी का दबाव न था उन पर सारे असत्य उन्होनें स्वयं ही स्वीकारें हैं कहते हैं बोझ बहुत है अनचाहे पथ पर चलने की पीड़ाओं का जो अनुचित जो अस्वीकार्य उसे स्वीकारने की विवशताओं का जो व्यक्त न कर पाये उन वेदनाओं का पर ये झूठ है छलावा है महज एक दिखावा है विवशताओं को ओढ़ मुखौटे की तरह बस अपने लिए सुख और साधन जुटाया है और अपने पराजित होने के एहसास को छुपाया है

