बस यूं ही रचे थे तुम्हारी याद में कुछ गीत
सोचा था सुनाऊंगा तुम्हें जब मिलोगी तुम
ये बताऊंगा कि मुझसे दूर होकर यूं ही
जब लिख रही थी तुम कुछ उदास गीत
तब भी शायद पहुंच रही थी सदाएं सारी
तुम्हारी मेरे हृदय तक और मैं भी
उन्हीं क्षणों में उकेर रहा था उन शब्दों को
कुछ खाली पन्नों पर,तुम्हारी आँखों तुम्हारे कानों के लिये /पर ये गीत ,ये शब्द पहुंचेंगें कैसे तुम तक/है ये असमंजस /कैसे समझोगी तुम कि लिखा है ये/सिर्फ तुम्हारे लिये/मैं चाहता हूं निकलो तुम अपने उदासियों के खोल से/ दिया होगा जीवन तुम्हें ईश्वर ने पर/जीवन जीने के हर क्षण पर अधिकार तुम्हारा/अपनी छवि के बंधनो में कैद/हम बिता देते हैं सारा जीवन/बस ये सोचते कि बस यही प्रारब्ध हमारा/यही नियति हमारी /न प्रारब्ध ,न नियति बस एक अनजाना भय /रोकता है हमें जीने से अपना जीवन अपने तरीक़े से/संसार चाहता है हम रहें कैद उन्हीं अपने आवरणों में लिपटे /बितायें वैसे ही सारा जीवन/क्योंकि जग को मिलता है तब/बातें करने का अवसर/तथाकथित मित्र तुम्हें मुक्त ही नहीं होने देंगें/तुम्हारे भय तुम्हारी काराओं से/झटको भय सारे, तोड़ो छवि की सारी काराएं/तोड़ो बंधन सारे/कुछ पलों के लिये भूलो सारे ही उदास गीत/भूलो उन्हें भी जो तुम्हें हैं भूले/ भूलो जग सारा /चलो किसी अनजानी डगर पर/निकलो किसी नये सफर पर एकाकी/खोजों स्वयं को ,पा लो स्वयं को/हम पा लें जब खुद को तो /जीवन सहज हो जायेगा

