ओ चिर परिचित अपरिचित
तुमसे परिचय है कितना गहन
तुम बिन बोले
बस शब्दों से ही जैसे पढ़ लेते हो सारा मन
क्या रखा है मिलने की औपचारिकताओं में
जब सब लगता है सुखद
भविष्य में कभी
एक अकस्मात भेंट की प्रबल संभावनाओं में
जब होगें सम्मुख हम -तुम
और करेंगें एक मौन मुलाकात
तब तक तुम अपने पथ
मैं अपने पथ चलता हूं
तुम जो कहोगी मुझसे मैं सुन लूंगा
तुम भी सुन लेना
मैं जो अस्फुट स्वर मेंं कहता हूं।