मैं धनावेशी यहां इस नाभिक में
इस आवेश शून्य, भावना रहित
न्यूट्रॉन के साथ पड़ा रहता हूं
बस बनाने के लिए संतुलन।
मैं महसूस करता हूं गहरा आकर्षण
श्रृणावेशी इलेक्ट्रॉन के प्रति
जो घूमता ही रहता है
अपनी सीमित कक्षाओं में
कभी-कभी ऊर्जा प्राप्ति से
थोड़ा उछल कूद मचा लेता है
अपनी ही कक्षाओं के मध्य
जब भी वो ऐसा करता है
एक तीव्र चाह
एक आशा सी जागती है मेरे भीतर
कि अब अपनी सीमाएं अपने बंधन तोड़ आयेगा
वो मुझसे मिलने
पर ऐसा कुछ होता नहीं
और मेरे भीतर भर जाती है
एक गहरी उदासी
मैं जानता हूं
शायद हमारा मिलना असंभव है
पर कभी-कभी मैं चाहता हूं
तोड़कर नाभिक के समस्त आकर्षण को
सब सीमाओं को
मैं ही मिल जाऊं उससे
एकाकार हो जाए हम
बस एक क्षण के लिए ही सही
यदि मिटता है तो मिट जाए
अस्तित्व हमारा।