अपने मुस्तकबिल पर मुकम्मल हक़ है तेरा
अपने जिस्म पर अपनी रूह पर मुकम्मल हक़ है तेरा
अपनी आवाज़ पे अपने हर अंदाज पे हक़ है तेरा
तेरा जिस्म आज़ाद तेरी रूह आज़ाद
तेरे खयाल आज़ाद तेरे लब आज़ाद
कुछ भी कर सवाल तेरे सवाल आज़ाद
क्यूं जकड़ी रहे तूं पुराने खयालों में
तूं ही क्यूं उलझी रहे सारे बंधनों में
तेरे लिए कुछ नामुमकिन नहीं
तेरे लिए कोई डगर मुश्किल नहीं
तेरे लिए कोई सफ़र मुश्किल नहीं
कुछ भी कर सकती है तूं
बस तुझे रखना ख़ुद पर यकीन है
तेरे पास है हौसलों के पर
तुझे छूने हैं नये फलक
तेरे पांव हों ज़मीं पर
मगर नजरों में आसमां हो
है तेरी परवाज़ आज़ाद

