बहुत दिन हुए छोड़े हुए जिन ठिकानों को
रहने दे छोड़,अब मुझसे उन छूटे हुए ठिकानों की न पूछ।
उसके झूठे वादों से कई बार फरेब खाया है मैंने
रहने दे छोड़, मुझसे उसके वादों और झूठे बहानों की न पूछ।
मुझे बहुत से लोग मिले जिनके हृदय थे काले
रहने दे छोड़,मुझसे उनके काले मन और उजले परिधानों की ना पूछ।
मेरा भी हक़ था साकी के हाथ के चंद पैमानों पर जो उसने दिए नहीं
रहने दे छोड़, मेरे हिस्से के जो साकी ने दिए नहीं उन पैमानों की न पूछ।
हर इक बादल को देखा बड़ी आस से कि शायद बरस जायें
रहने दें छोड़, बारिश के लिए तरसते ,अपने खेतों में खड़े नाउम्मीद बूढ़े किसानों की न पूछ।
दुनिया की पाबंदियों और पहरे के बावजूद अब भी ज़िंदा हैं जिनकी आंखों में ख़्वाब
रहने दो छोड़, मुझसे उन आंखों की,उनमें चमकते सुनहरे आसमानों की न पूछ।
मैंने उन घरों की चमकती दीवारें, मजबूत छत,कमज़ोर नींव सब कुछ देख ली
रहने दे छोड़,मुझसे से उन ढहते हुए मकानों की न पूछ।