कौन रखता है इक मा'मूली से ना-ख़ुदा को याद
साहिल पे कश्ती से उतर जाने के बाद
सोचता हूं उस बज़्म में,कौन करता होगा मुझे याद
मेरे वहां से उठकर, यूं चले आने के बाद
मैं आईने को ही झूठा बताता रहा
अपना असली अक्स नज़र आने के बाद
उनका रंग मुझ पर और चढ़ता रहा
उनका रंग उतर जाने के बाद

