निकला है दिल सफ़र में, है इसे किसी की जुस्तजू भी

ठहरा है इक जगह कहीं, है किसी का मुंतज़िर भी


पशोपेश में हूं, कैसे ज़िक्र करूं उससे उस बात का

जो बात उससे निहां भी है, है उसपे ज़ाहिर भी