आह मृत्यु जब आओगी तुम मिलने

पता नहीं कर सकूंगा स्वागत तुम्हारा

मैं खुले मन से अपनी बाहें पसार

या कहूंगा यही ,करुंगा तुमसे प्रार्थना

अभी तक तो मैं जी न पाया ढंग से

कुछ और पल दे दो मुझे उधार

मैं लूं कुछ अपने बाकी कर्ज उतार

लौटकर कुछ दिनों बाद आना मेरे द्वार

पता नहीं मेरे निर्वाण पर

एक भी अश्रु बहायेगा ये संसार

मुझे छोड़ने हैं जीवन पथ पर

अपने पग के कुछ निशान

करने हैं कुछ अधूरे गीत पूरे

करनी है पूरी कुछ अधूरी प्रेम गाथाएं

निभाने हैं कुछ आखिरी कर्तव्य

कुछ दिनों बस मोहलत चाहिए

फिर मैं कुछ न कहूंगा

चल पड़ूगां संग तुम्हारे

अंतिम यात्रा पर

जीवन के उस पार

मृत्यु तुम तब आना मेरे द्वार

करुंगा स्वागत तब तुम्हारा

मैं अपनी दोनों बांहें पसार