क्यों मीरा ने कृष्ण को चुना
अपनी प्रीत के लिये
कृष्ण जिनसे वो कभी मिली नहीं
कभी नहीं सुनी उनकी मुरली की तान
कभी नहीं गोपियों के संग,समवेत
यमुना के जल में की कल्लोल क्रीड़ाएं
मीरा ने क्यों त्यागे सारे राजसी सुख
क्यों सहे ताने समस्त जग के
क्यों दुखों को अपनाया
क्यों पीडा़ओं को गले लगाया
क्यों विरही बन भटकी वन -वन
क्यों बस कृष्ण के ही गीत गाए
क्या समझ सकता है
आज जग ऐसी प्रीत
जहां संबंधों को सर्वदा तौलते हैं
हानि-लाभ के तराजू पर
कुछ संबंध जन्म लेते हैं
अनजाने ,अनबूझे
कल्पनाओं के परे
जिन्हें तौला नहीं जा सकता
सामान्य संबंधों की
सांसारिक कसौटी पर
उन्हें परिभाषित नहीं किया जा सकता
किसी बंधे बंधाये खांचे मेंं
उन्हें देखने के लिये
अलग ही दृष्टि चाहिए
उनके लिए गढ़नी होंगी
कुछ नयी परिभाषाएं
तर्क और बुद्धि से परे
भावनाओं के समीप