आंखों से जो छिटके फिर भटके जाने कहां-कहां
मेरे सपने तो अब जैसे बंजारे हो गये हैं ।
घेर लिया है मेरे मन का पूरा नीला आकाश
मेरे सपने जैसे आसमान में बिखरे तारे हो गये हैं ।
मैं कहां तक संभालूं अब इनके डगमग पांवों को,
पीकर प्रीत का प्याला मेरे सपने मतवारे हो गये हैं ।
भटके हैं अपनी राहों से ,मुश्किल है अब राह पर लाना
मेरे सपने गलियों-गलियों फिरने वाले आवारे हो गये हैं ।
कई बार जलाने लगी हैं अब आंच इनकी मुझको
मेरे सपने जैसे दहकते सुर्ख अंगारे हो गये हैं ।
आंखों से जो छिटके फिर भटके न जाने कहां-कहां
मेरे सपने तो अब जैसे बंजारे हो गये हैं ।

