कई बार ऐसा होता है
जब हम बहुत कुछ कहना चाहते हैं
उन सबसे जो होते हैं
हमारे निकट या
जिनके हम होते हैं निकट ।
करते हैं हम कल्पनाएं
उन लम्बे वाक्यों की
जो कहना चाहते हैं।
सोचते हैं ये कहना ,है वो कहना है
ये कह लेगें, वो कह लेगें
ये कहना आवश्यक है
ये बताना जरूरी है
ये जताना जरूरी है।
दोहराते हैं ,अभ्यास करते हैं
पर जैसे ही वो अवसर आते हैं
सारे शब्द ,सारे वाक्य
कंठ में कहीं अटक से जाते हैं ।
निकलते हैं
कुछ औपचारिक,ऊबाऊ
घिसे पिटे वाक्य
और फिर पसर जाता है
एक गहरा उदासीन मौन
जो टूटता ही नहीं
बल्कि और भी
पसर जाता है
और भी मन में गहरे कहीं ।
इतना विस्तार कि बस रह जाती है
इक चुप्पी।

