तपती धूप से
प्यास की मारी चिड़ियां
दो घूंट पियेगीं
मिट्टी के बर्तन से
पेड़ की छाया में रखा पानी
फिर अपने-अपने रस्ते उड़ जायेगीं
आयेंगीं
नन्ही-नन्ही गिलहरियां फुदकते-फुदकते
रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े
अपने नन्हे नन्हे मुंह में दबाकर
कुतर कुतर कर खायेगीं
इधर-उधर कूद कूदकर
धमाचौकड़ी मचायेगीं
एक कौआ
हर दिन आता है जो,आयेगा
मुंडेर पर बैठकर,
कांव-कांव कर मांगेगा
अपने हिस्से की रोटी,
पाकर रोटी का टुकड़ा
वो भी उड़ जाएगा
भूखे कुत्ते भोजन की आस में
शाम से ही द्वार के बाहर मंडरायेंगे
पशु हो या पाखी जहां से
कुछ मिलने की आस हो
वहीं तो जायेंगे
जहां से लौटना पड़े खाली हाथ
मांगने का ना हो सम्मान
वो भी भला वहां क्यों जायेंगे