पांव धूप में जब जले तो भी कुछ ग़म न था
सर पर मां की दुआओं का साया तो था।
राहें कंटीली थी ये पता था हमें चलने से पहले ही
पर उन राहों पर चलने का जोखिम उठाया तो था।
जिंदगी की जद्दोजहद में ठोकरें खाईं कितनी ही मैंने
टूट कर बिखरा नहीं मैं सौ बार जिंदगी ने आजमाया तो था।
जब तक था दम सीने में जब तक थीं सांसें चल रही
लहरों से खेला था तो था मैं तूफानों से टकराया तो था ।
माना कि गहरे थे अंधेरे और न मिटते आसानी से
मगर मैंने अपने हिस्से का दिया जलाया तो था।
तुम्ही न सुन पाये जाते हुये मेरी कोई भी आवाजें
मैने तुम्हें पुकारा तो था, वापस बुलाया तो था।
उसने पढ़ ली मेरे चेहरे पर लिखी दर्द की इबारत तो क्या करुं,मैं दर्द अपना छुपाकर मुस्कराया तो था।
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