मैं अक्सर हूं कितने टुकड़ों में बंट जाता
कुछ अपने का कुछ औरों का हो जाता
लगते अपरिचित कुछ जग को
कुछ में अपने जैसा जग है कुछ पाता
कुछ हिस्सों को मेरे जग है अपनाता
कुछ को निर्मम ठोकरें है लगाता
कुछ में मैं नीर बहाता
कुछ में हूं मैं मुस्कराता
कुछ में मैं टूट कर बिखर जाता
कुछ मैं मैं निखर संवर जाता
कुछ में मैं दिखला देता हूं सब
कुछ में मैं सब कुछ हूं छुपा जाता
कुछ मेंं हूं मैं चलता रहता
कुछ में मैं ठहर जाता
कुछ में मैं भटका हूं पथ से
कुछ में सीधी राह मैं हूं चलता जाता
कुछ में संबंधों का सारे किया निर्वाह
कुछ मेंं संबंध मैं निभा न पाता
कुछ में पालता मोह कितने
कुछ में रहता मैं जैसे हूं विरक्त
कुछ हिस्से रहते वरदान लिए
कुछ हैं जैसे शापित अभिशप्त
कुछ में पलते अपनत्व,प्यार ,प्रीत
कुछ मे पलती कितनी ईर्ष्याएं ,घृणाएं
कुछ में कभी रहता मैं मुखर
कुछ में ओढ़ लेता हूं मौन
कुछ हिस्से मुझे परिचित लगते
कुछ से मैं खुद पूछता कि तुम कौन
कुछ में भग्न स्वप्नों का है बसेरा
कुछ में हूं मैं नित नये स्वप्न सजाता
कुछ में पलती वेदनाएं कितनी
कुछ में हूं मैं गीत गाता
कुछ में हूं मैं जीता
कुछ हिस्सों मेंं हूं मैं मर जाता
अक्सर मैं हूं कितने टुकड़ों में बंट जाता

