मध्य तुम्हारे हमारे

परिचय- अपरिचय के बीच

कितना कुछ

कुछ सुना कुछ अनसुना

कुछ कहा कुछ अनकहा

कुछ सच कुछ सपना

कुछ पराया कुछ अपना

कुछ अंधियारा कुछ उजियारा

कुछ पीड़ाएं कुछ प्रसन्नताएं

कुछ आशंकाएं कुछ संभावनाएं

कुछ शब्द कुछ गहरे मौन

कुछ आगे कुछ पीछे 

कुछ साहस कुछ बेबसी

कुछ अपराधबोध कुछ बेबाकी

कितना कुछ है घटता

कौन किसे समझता

पथ तेरे कितने अलग

कितने अद्भुत सपनों से भरे

मेरे पथ अलग

क्यों दो इतने अलग पथ मिले

किसे समझ कौन समझाए

पर ये सच है तो है समझना

लक्ष्य तुम्हारा ,सपने तुम्हारे

इनसे विचलित तुम्हें कोई भी क्यों करे

तुम्हारे चमकते सपने सुनहरे

जो फिर से हुए हैं हरे

अब मुरझाये क्यों

सूखे क्यों ,अपनी शाखों से क्यों झरे