इस आभासी छाया नगरी में

एक भी कल्पित संबंध निभा नहीं पाया ।

जाने किस किस को ठेस लगाई

किस किस को दुख पहुंचाया।

क्या पढ़ा, क्या लिखा, क्या देखा

क्या समझा, क्या समझाया।

कितने स्वप्न तोड़े अपने

कितने टूटे स्वप्न औरों के भला जोड़ पाया।

कितनी आस बांधी, कितनी आस तोड़ी

किसी और को कब कोई आस बंधा पाया।

कितने अर्थहीन गीत स्वयं रचे

कितने मधुर गीत औरों से सुने

कौन सा गीत बेसुरे स्वरो में

अपनी ही धुन में गाया।

किस -किस को अपना बनाया

कर दिया किस- किस को पराया।

क्या उलझा रहा अपने ही भ्रम जालों में

या किसी और को भी उलझाया ।

अधिकार कभी किसीको दिया नहीं

अधिकार कभी किसी से मांग न पाया।

बंधन में बंधा नहीं स्वयं

बंधन में बांध न पाया।

कितने अधरो पर हास दिया कुछ पता नहीं

पर क्यों लगता है कुछ आंखों में अश्रु मैं दे आया।

कैसे कहूं किस किस ने छुआ मेरा मन

क्या ज्ञात मुझे किस किसका मन मैं छू पाया।

मेरे अधरों का मौन उपजा था मेरे अंतर्मन के एकाकीपन से

क्यों इसे मैने और हृदयों तक फैलाया।