जब जलने से तुमको डर है लगता
तब कूदे ही थे क्यों तुम अंगारों में । .
जब डूबने से लगता है डर
तब उतरे ही क्यों इन मंझधारों में ।
जब कांटों की चुभन से होता है दर्द
तब आये ही क्यों इन गुलजारों में । .
जब जलकर कर नहीं कर सकते थे उजाले ..
तब आये ही क्यों थे इन अंधियारों में।
जब बिकने की हसरत ही नहीं थी . क्यों दाम लगाया अपना इन बाजारों में । पता तुम्हें था होगी यहां हवाओं में घुटन
फिर आये ही क्यों तुम इन गलियारों में ।
औरों के लिए -गैरों की खातिर थे जितने भी थे इशारे
तुमने आखिर क्या देखा अपने लिए उन छुपे इशारों में

