वो जो बैठ किनारे बस देखते रहते हैं लहरों के मंज़र
उनके हिस्से में भी कोई भंवर कोई दरिया तूफानी दे दो
लगता है खून रंगों में उनके जम सा गया है
रंगों में दौड़ सके उनके लहू को ऐसी रवानी दे दो
खो गया है बचपन जिनका जिंदगी की जद्दोजहद में
उनको थोड़ा सा बचपना थोड़ी सी शैतानी दे दो
वो जो हो गयें है वक़्त से पहले अपनी उम्र से बड़े
उनको थोड़ा सा जोशो-खरोश थोड़ी सी जवानी दे दो।
वो जो रहते हैं महलों में जिन्हें पता नहीं हकीक़तों का
उन्हें थोड़ी मुश्किलें कुछ बलाएं आसमानी दे दो
वाइज़ करता रहता है हर वक़्त बातें अपने इल्म की
उसे भी थोड़ी सी बेवकूफी थोड़ी सी नादानी दे दो
वो जो निहायत पाबंद हैं अपने उसूलों पर चलने के
उनको भी थोड़ी सी गुस्ताखी थोड़ी सी नाफरमानी दे दो
मौत के बाद भी रहे जो जिंदा करे जिसका जिक्र ज़माना
मुझे भी ऐसा कोई अफसाना ऐसी कोई कहानी दे दो