पति पत्नी ये इस जीवन में ऐसा नाता है
जिसमें प्रेम चांद सदृश कलाएं दिखलाता है । पल पल जैसे बदलता रहता है
बढ़ते बढ़ते घटता है घटते घटते बढ़ जाता है।
कभी पूर्णमासी का चांद बन आता है
कभी अमावस का अंधियारा छाता है।
पर यही एक नाता है जो निभे अगर तो
जीवन पथ पर साथ अंत तक निभाता है। सुख-दुख के थपेड़े सारे
साथ खड़े रहकर सह जाता है
कटु दंशों को देने का अधिकार सौंपता
सिर्फ एक दूसरे को ,कोईऔर दूसरा
कहां इन सीमाओं का अतिक्रमण कर पाता है । चांदनी सा हो निर्मल ,धवल स्नेह बंधन
हाथों की ,पैरों की गहरी मेंहदी जैसे
मांग के सिंदूर जैसे हों
प्यार के रंग गहरे बस यही मांगकर
उन चमकीली ,सपनीली ,पनीली आंखों वाली
स्त्री का कोमल मन रह जाता है।
मात्र स्नेह के बंधन को क्या ये अधिकार नहीं
क्या सामाजिक बंधनों से परे
उपज सकता सहज प्यार नहीं
क्या भावनाओं पर लग सकते हैं अंकुश
क्या भावनाओं पर लग सकते हैं पहरे
क्या भाव जीवन में जो हैं जागते
कहीं मन में
सामाजिक नैतिकताओं के परे
बंधनों की सीमाओं से मुक्त उनका कोई अर्थ नहीं
कोई भी मोल नहीं
या है अधिकार उन्हें भी ये उत्सव मनाने का