सुनो कान्हा तुमने मुझे ही क्यों चुना

अपनी अलौकिक प्रीत के लिए

क्या तुम्हें स्थापित करनी थी

प्रेम की सार्वभौमिकता

संबंधों की मानक सीमाओं से परे

दूरियों की सीमाओं से अबंधीं

अपेक्षाओं के बोझ से मुक्त

किसी भय ,किसी अपराध बोध से मुक्त

कभी संयत

कभी उश्रृंखल कभी उन्मुक्त

कभी छुपी, कभी व्यक्त

समर्पण की पराकाष्ठा

एकीकृत एकाकार होने की

अभूतपूर्व अलौकिक घटना

एक अनोखी अनुभूति

जिसकी न कभी हो पुनरावृत्ति

वो संबंध जिसका कोई नाम नहीं

वो संबंध जिसको परिभाषित न किया जा सके

अपेक्षाओं ,आकांक्षाओं,आशाओं का कोई बोझ नहीं

 जो बांधता नहीं पैरों में कोई बंधन

जो पहनाता नहीं पैरों में कोई बेंड़ियां

जो नहीं जताता हर समय अधिकार

जो न सिखाता कभी न कभी सीखता

बस है किया जाता, बस है जिया जाता

वो सार्वभौम, वो सत्य जो बसा तो निकल न पाता

जो अंकित हुआ एक बार

तो फिर कभी मिट न पाता

जो गीतों मेंं है झलकता

बंसी की तानों मेंं हैं गूंजता

जो हवाओं मेंं है मचलता

जो पेड़ ,पौधों पुष्पों मेंं

होता पुष्पित ,पल्लवित

जो यमुना की कलकल धाराओं मेंं

होता अविरल प्रवाहित

जो कर लेता हृदय मेंं सब कुछ समाहित

जो उगता उर में एक बार तो फिर कभी न सूखता जिसका जन्म बदल देता है सब संसार

समझ नहीं आता डूबे हैं कि उतरे हैं पार

जो बसा अंतर में एक बार

तो मात्र सत्य और सौंदर्ययुक्त

दिखता है सब संसार

जो ईष्या,द्बेष ,लोभ क्रोध को देता जड़ से मार

कान्हा ऐसी ही है तुम्हारी प्रीत

ऐसा है तुम्हारा प्यार

काल की सीमाओं से परे ,बंधनो से मुक्त

अलौकिक, अमूर्त ,अखंड ,तृप्त 

पर तुम खोये हो अपनी ही किसी धुन में

लगता है तुमने प्रश्न मेरा नहीं सुना

मुझमें ऐसा क्या था कि

तुमने अपनी प्रीत के लिए मुझे ही क्यों चुना