चाहता हूं मैं ओढ़कर गहन मौन
कहीं किसी निर्जन वनों में सो जाऊं।। कोलाहलों से परे
किसी पहाड़ी अनदेखी जगह पर
ढूंढ़ता हुआ कोई नया पथ खो जाऊं।
मैं यहां कुछ और होकर ही जीता रहता हूं
सोचता हूं बस कभी कुछ दिनों,
मैं स्वयं होकर जी जाऊं।


चाहता हूं मैं ओढ़कर गहन मौन
कहीं किसी निर्जन वनों में सो जाऊं।। कोलाहलों से परे
किसी पहाड़ी अनदेखी जगह पर
ढूंढ़ता हुआ कोई नया पथ खो जाऊं।
मैं यहां कुछ और होकर ही जीता रहता हूं
सोचता हूं बस कभी कुछ दिनों,
मैं स्वयं होकर जी जाऊं।