चाहता हूं मैं ओढ़कर गहन मौनकहीं किसी निर्जन वनों में सो जाऊं।। कोलाहलों से परेकिसी पहाड़ी अनदेखी जगह परढूंढ़ता हुआ कोई नया पथ खो जाऊं।मैं यहां कुछ और होकर ही जीता रहता हूंसोचता हूं बस कभी कुछ दिनों,मैं स्वयं होकर जी जाऊं।