विस्तृत, विशाल राजपथ
कब आते हैं मिलने
सूनी ,सिमटी पगडंडियों से
शिखरों के कंगूरे
सुन कहांं पाते हैं
नींव के पत्थरों के क्षींण स्वर
संसार में सदियों से
ऐसा ही होता आया है
कुछ लोगों के हाथों में ही
रहता है निर्णय
सबके जीवन के भाग्यों का
बीच-बीच में दिलासाएं
आती जाती रहती हैं
बाकी सबके भाग्य रहते हैं
ईश्वर के भरोसे
भाग्य भरोसे
सोचता हूं कभी-कभी
किसने गढ़े इतने सारे ईश्वर
उन्होंने जिनके हाथों मेंं थे भाग्य
उनको बहलाने के लिए
जिनके भाग्य थे कैद
या उन्होने जिनके भाग्य थे कैद
किन्हीं और मुठ्ठियों में
क्योंकि उन्हें भी कुछ तो चाहिए था
अपनी सांत्वनाओं के लिए
अपनी दिलासाओं के लिये
अपने विश्वास के लिए
या फिर अपनी अकर्मण्यताओं का
दोष मढ़ने के लिए

