ये जो खाली गड्ढा और उसमें पड़ा कचरा देखकर. तुम जो नाक बंद कर निकल जाते हो तुम्हें क्या पता कि मेरा एक रंगीन अतीत है
मेरा एक गौरवशाली इतिहास है
मैं एक विस्मृत भुला दिया गया
उपेक्षित घूरा हूं
कभी मैं भरा जाता था . ..
और भरा रहता था ताजे ताजे गोबरों से
महकता रहता था दिन भर खुश्बुओं से... ..
मैं दूर से ही पहचान लेता था
मात्र खुश्बू से कि
कौन से गोरू का गोबर आ रहा है .
मुझमें भरे जाने के लिए . ...
अपने अंतर की आग से पकाता रहता था
गोबर को मैं तब तक
खाद नहीं बन जाती थी जब तक ..
. जब पके हुए गोबर की खाद .
खांचियों से निकालकर
बैलगाड़ियों मेंं लादकर
किसान खेतों में पहुंचाता था खेतों तक
वो खाद है
मेरी ही निर्मिति
जन्म जिसका मेरे उदर से है हुआ
जानकर गर्व से फूल जाता मैं
उस खाद को खेत मेंं जब छिड़कते
और फैलाते पूरे खेत के सीने पर
बोये जाते नये बीच ,सींचतीं वर्षा की बूंदें और सिंचाई का पानी
जब खाद पानी से तृप्त
खेतों मेंं खड़ी होती लहलहाती फसल
तब उससे दूर भी रहकर
मैं जानता ये मानता ये कि
मेरा जीवन है सफल
मैंने भी अपने जीवन मेंं है कुछ किया
मैंने भी जीवन अपना जिया
कोई कहे कुछ भी पर
कर्तव्य मैंने अपना सारा निभा दिया
आज भले ही मैं रिक्त हूं त्यक्त हूं
कचरे फेंकने का गड्ढा मात्र हूं
पर एक समय मैं ने भी अपना
समृद्ध भरपूर जीवन है जिया
मुझे कोई उलाहना नहीं
अपने बीते हुए कल से
अपने अतीत से
और अपने वर्तमान से
क्योंकि समय चक्र के साथ
सब कुछ बदलता है
पर मैं हूं तो एक घूरा ही
इस लिए रहता हूं आज भी आशान्वित .
कि मेरे दिन फिर दोबारा फिरेंगें
.
.. ...

