मैं देखता हूं एक भयावह स्वप्न
एक कमरा है, कहीं किसी बड़ी इमारत में
वहां श्वेत वस्त्रों में आकर सो जाती है
एक परी थकी-मांदी सी
न जाने कहां से उतरता है
गहरा घुप अंधियारा जो चुपचाप
रोशनी भरे कमरे में भर जाता है
उसके बाद कुछ भी नहीं,
कुछ भी नहीं दिखाई देता
सुनाई देती है सिर्फ़ असहाय चीखें
कातर पुकारें, करुण क्रंदन ।
अगले दिन
श्वेत कोट पहने लोग सड़कों पर हैं
आंखों में क्रोध,भय ,असहायता
और विवशता भरा आक्रोश लिए
भीड़ बढ़ती जा रही है,
शोर बढ़ता जा रहा है
जो आवाज़ें सुनी जानी चाहिए
धीरे-धीरे दबने लगीं हैं
धीरे-धीरे दब जाएंगी
क्योंकि ,
आवाज़ों को अर्थहीन कोलाहल में
बदलना उन्हें अच्छी तरह आता है।
कौन वो?
आप जानते हैं।