दुनिया सिर्फ गुलो-गुलशन की ही नहीं
दुनिया बिखरे हुए कितने खारों की भी है।
दुनिया चिताओं की बुझी हुई बस राख भर नहीं
दुनिया दिल में जलते अंगारों की भी है।
दुनिया सिर्फ बसे बसाए लोगों की ही नहीं
दुनिया दरबदर भटकते खानाबदोश बंजारों की भी है।दुनिया सिर्फ घरों में चैन की नींद सोने वालों की ही नहीं
दुनिया फुटपाथ पर सोये लाचारों की भी है।
दुनिया सिर्फ जश्न में डूबे लोगों की ही नहीं
दुनिया मातम मनाते दर्द के मारों की भी है।
दुनिया सिर्फ अच्छे लोगों की ही नहीं
दुनिया झूठे, बेईमानों और मक्कारों की भी है।
दुनिया सिर्फ़ गांव के सादा हाटों की ही नहीं
दुनिया शहरों के सजे चमकते बाजारों की भी है।
दुनिया सिर्फ किनारों की ही कहानी नहीं
दुनिया कहानी,लहरों ,तूफानों और मझधारों की भी है।
दुनिया सिर्फ जीते हुए लोगों की ही कहानी नहीं
दुनिया जो लड़ते-लड़ते हार गये ऐसे किरदारों की भी है।

