देखता हूं

आज जब दृश्य इतने वाह्य

टूटी हुई कितनी ही सांसें ,

सागर सी पीड़ाओं को समेटे ,

न जाने कितने ही मन ।

मिट गये

एक लघु कण के कारण

न जाने कितने जीवन ।

असमय मृत्यु ने छीनीं कितनी सांसें

मुरझाएं असमय कितने ही जीवन ।

नीर भरे न जाने कितने नयन

वेदनाओं से व्यथित, विकल ,विह्वल

न जाने कितने ही मन ।

बस सोचता हूं मैं यही

आना क्या ,जाना क्या

चलना क्या, रुकना क्या

थकना क्या, सुस्ताना क्या

ठहरना क्या, चले जाना क्या

खोजना क्या, पाना क्या

उनका क्या अपना क्या

दुख क्या ,सुख क्या

खोना क्या, पाना क्या

बनाना क्या, मिटाना क्या

संजोना क्या, लुटाना क्या

उभरना क्या, डूब जाना क्या

संवरना क्या, बिखरना क्या

अश्रु बहाना क्या ,मुस्कराना क्या

जताना क्या छुपाना क्या

रह जाना क्या, चले जाना क्या

आना क्या और चले जाना क्या

न आने पर अधिकार कोई

न जाने पर कोई नियंत्रण

फिर इतराना क्या

और इठलाना क्या?