आहत तन है आहत मन है आहत सारा जीवन है
कल्पनातीत हैं उस अपमान की पीड़ाएं
वो विकल वेदनाएं मन से निकल न पाएं
जो घाव हैं तन के मन के अब तक न भर पाए
प्रश्न तो बहुत हैं पर उत्तर की नहीं कोई अपेक्षाएं
पर अब ये आवश्यक है कोई तो इन प्रश्नों को उठाए
सोचती हूं क्यों उस भरी सभा में
झुके शीश उठ न पाएं
क्यों न अधरों पर किसी के प्रतिरोध के स्वर आये
मुझे न थी आशा द्यूत में हारे हुए अपने पतियों से
जो बंधे थे युधिष्ठिर के वचनों से
क्यूं करती दया की आशा मैं कर्ण और दुर्योधन से
क्यों करती मैं कोई अपेक्षा धृतराष्ट्र से
पर भीष्म आप क्यों रहे मौन शीश झुकाए
कौन से बंधन कौन सी विवशताएं
कौन से वचन कौन सी प्रतिज्ञाएं कौन सी निष्ठाएं
सत्य से बड़ा है क्या कोई धर्म
असहाय अबला नारी की
अस्मिता रक्षा से बड़ा भी है क्या कोई कर्म
क्यूं न उस दिन आप समझ पाए ये मर्म
कहता है सारा जग भीष्म आपको
है आपको भी अपनी सत्य निष्ठा और
वचन बद्धता पर अभिमान बड़ा
पर मुझे लगता है आपने भी नहीं दिया
कभी नारी को उचित सम्मान
उस दिन आपका मौन मुझे अखर गया
क्यों न किया प्रतिकार आपने
दुर्योधन की धृष्टताओं का कुत्सित इच्छाओं का।
क्यों न तोड़ डाले आपने बंधन सारे
क्यों न तोड़ डाले वचन सारे
क्यों न तोड़ डाली सारी प्रतिज्ञाएं
पर यदि डालती हूं मैं दृष्टि आपके जीवन पर
आते हैं स्मरण कितने ही दृष्टांत
जिसमें लगता है आपने लिये निर्णय कितने ही
मात्र अपने पौरुष की संतुष्टि के लिए
किये कर्म कितने ही अपने अहं की तुष्टि के लिए
पर जो थे सर्वथा विरूद्ध नारी की निज इच्छाओं के
क्या कोई मूल्य न था सत्यवती की निज इच्छाओं का
आपने क्यों नहीं किया विरोध
तात शांतनु की अनैतिक इच्छाओं का
वासनाओं में डूबी कामनाओं का
कर डाली प्रतिज्ञा जीवन भर ब्रह्मचर्य की
दे डाला पिता को क्षण भर में वचन
पर क्या की थी कभी आपने चेष्टा
एक बार भी जानने की सत्यवती का मन
अम्बा अम्बिका अम्बालिका के स्वयंवर में
जाने का आपका था क्या अधिकार
पौरुषहीन विचित्रवीर्य के लिए
क्यों तोड़ डाली आपने सारी मर्यादाएं
सब सत्य जानकर भी आपने कर डाला
उन कुमारियों के स्वयं वर चुनने के
अधिकार का क्रूर हनन
उनकी कोमल इच्छाओं का कर डाला दमन
जो था उनका अधिकार
कितनी निर्ममता से किया आपने प्रहार
पर लगता है जैसे जग प्रशंसा स्तुति और आत्ममोह
ने छीन ली निर्णय की दृष्टि आपकी
उचित अनुचित का भेद
जकड़े रहे आप जीवन भर
झूठी मर्यादाओं के बंधनों में
ढोते रहें निरर्थक वचनों का बोझ
सोचती हूं मैं यदि आप प्रारम्भ से ही करते
अनीति अन्याय का प्रतिकार तो सम्भवतः
कुरूवंश का इतिहास कुछ और होता
दुर्योधन ने किसके भरोसे वीणा उठाया था युद्ध का
यदि आपने उस दिन भी भरी सभा में
कर दिया होता प्रतिकार मेरे साथ हो रहे अन्याय का
फ़ेंक दी होती सारी मर्यादाएं तोड़ दिये होते सारे वचन
कर दी होती ये घोषणा कि अब आप बंधनों से हैं मुक्त
और देगे अब आप साथ सत्य का
तब इतिहास की दिशा ही कुछ और होती

