मैं जानता हूं कि गहरी निराशा होगी
मुझसे मिलकर उन लोगों को
जिनको मुझसे बहुत आशाएं हैं,
क्योंकि संभवतः मैं
उनकी कल्पनाओं से मेल नहीं खाऊंगा।
पर मैं नहीं चाहता, निराश करना उन्हें
इसलिए मैंने खड़ी कर ली है
उनके और अपने मध्य
अपरिचय की मजबूत दीवारें
जो गिर न सकें,जो टूट न सकें
यदि टूटे भी तो भला किसी अपरिचित से
क्यों कोई आहत होगा ?
पर दीवार के कुछ हिस्से
मैंने जानबूझकर कमजोर रखें हैं
जिनके उस पार मुझे दिखते हैं वो लोग
जो शायद कभी
दीवार का वो हिस्सा गिरा दें
या मैं स्वयं ही ढहा दूं
बिना परिणाम की आशंका किए हुए।