चला तो था मैं ठीक-ठाक ही मगर क्या पता

कहां राह छोड़ी मैंने और कहां भटक गया ।


जो दिल में आया, जो समझा ठीक किया मैंने

कुछ निगाहों मेंं बस गया मैं, कुछ मेंं खटक गया।


मैं चलता ही रहता हूं अपनी धुनों में लगातार

कहीं उलझा मैं थोड़ी देर, कहीं मैं थोड़ा अटक गया।



कुछ तनहा, उदास,बुझा,खामोश ,सोया सा था दिल कई दिनों से

कुछ कदमों की आहटों आईं कि फिर से जरा जग गया।


मुरझाये से जाते थे सारे ख्वाब मेरे दिल के गुलशन मेंं

कुछ आवाजों से खिल उठा ये गुलशन ,महक-महक गया ।


मैं इतनी आसानी से तो होश कभी खोता न था

पर किन्ही खयालों में आज फिर कुछ बहक गया।


दिल हो चला था जैसे बेजान सा पत्थर कोई 

मगर किसी ने पुकारा इस तरह कि बस धड़क गया।