कितनी अजीब सी बात है

हम उलझे रहते हैं

घूमते रहते हैं अपनी सीमित परिधियों में

कभी दे नहीं पाते धन्यवाद उनका

जो कहने को होते नहीं अपने

पर कितने अपने होते हैं।

जो जीवन पथ पर

यूं ही जुड़ जाते हैं हमसे कहीं न कहीं

वो अनजान हाथ जो थामते हैं हर वक्त

वो अनदेखी आवाजें

जो देती हैं हौसले हर मुश्किल घड़ी में

करती हैं प्रेरित

गिर -गिर कर भी संभलने के लिए

हो थकें तो भी चलने के लिए ।

उन चेहरों को जिनके देखे बिना

सुबहें कुछ अधूरी सी रहती हैं

जिनके होने मात्र से लगता है

जीवन भरा पूरा

जिनकी ऊर्जा से मिलती है जिजीविषा।

कभी हम कर नहीं पाते

क्षमा याचनाएं उनसे

जिन्होंने हमसे निकटताएं चाहीं

पर हम जिनसे दूर रहे

या हम जिनके निकट होकर भी दूर रहे ।

उनसे जिन्होनें

हमें जितना स्नेह ,प्रेम दिया

लौटा न सके हम उतना भी।

उन कठोर शब्दों के लिए

जो कहे गये क्षणिक आवेश में

पर जो दे गये गहरे घाव

और जिनका पश्चाताप कर न सके।

उन पीड़ाओं के लिए

जो औरों ने सही अकारण ,अपने कारण ।

उन ठेसों के लिए

जो जाने अनजाने पहुंचायीं गयीं ।

वो अर्थहीन अंहकार

जो दिखाये गए ।

उन सारे मिले स्नेहों का

जिनका प्रतिउत्तर

कभी दे न पाए चाहकर भी।

उन हाथों से

जो बढ़े हमारी तरफ

कितनी आशाएं लेकर

पर हम उन्हें थाम न पाए ।

उन दृष्टियों से

जो उठी हमारी तरफ

कितनी याचनाएं लेकर

पर जिनसे मिलने पर

या तो मुंह फेर लिए हमने

या फिर दृष्टि झुका ली।

उन संबंधों से जो बनाए हमने

पर जिनको निभा न पाए।

उन घावों के लिए

जो दिए किसी को हमने

पर जिन पर मरहम कभी लगा न पाए ।

उन आंखों से

जिनके स्वप्न हमारे कारण मुरझाए ।

उन अपेक्षाओं से जो की गई हमसे

पर जिन पर हम खरे न उतर पाए।