मैं कब कहा सका वो सब कुछ
जो मैं कहना चाहता था।
ऐसा नहीं कि
मैं चुप रहना चाहता था।
ऐसा नहीं कि, जो मैंने कहा नहीं
वो मैं कहना नहीं चाहता था।
कहूं या न कहूं
इसी उधेड़बुन में
बीत गया समय कहने का।
फिर लगा कि अब क्या कहना
कितना अर्थहीन हो जाता है
असामयिक कहना।
कभी कभी सोचो तो
खल जाता है अतीत का चुप रहना।