कितनी चीटियों को हमने मार दिया
अनजाने में
अपने पांव के नीचे रौंदकर
जानकर -
पोंछे के कपड़े से रगड़कर,
झाड़ू में बुहार कर।
हमारे लिए कोई घटना न थी
या महत्वहीन घटना थी
चींटियों का इस तरह मरना।
चीटियों के मरने का
हमने कोई शोक नहीं मनाया
क्योंकि
वह हमारी दृष्टि में तो
बहुत तुच्छ थीं।
उनके होने या ना होने से
हमारे ऊपर
कोई अंतर नहीं पड़ता,
पर
शायद कुछ और दिन
जीवित रह जाती वो चीटियां,
अगर इस तरह असमय नहीं मरतीं
शायद वो अपना पूरा जीवन जी लेतीं।
२.कभी कभी ऐसा लगता है कि
संसार में अधिकतर मनुष्यों का जीवन
चींटियों जैसा ही होता है
वो अपने से ताकतवर लोगों के
पैरों तले आकर कुचला जाता है या
झाड़ू के नीचे आकर ख़त्म हो जाता है।
कोई परवाह नहीं करता
इन चींटियों जैसे मनुष्यों की
असामयिक मृत्यु की
क्योंकि इनके होने या न होने से
किसी को कोई अंतर नहीं पड़ता ।
इनकी याद तभी आती है जब
कारखानों में काम करने के लिए,
निर्माण कार्य स्थलों के लिए,
सड़के बनाने के लिए,
पत्थरों को तोड़ने के लिए,
बारुद की , पटाखों की फैक्ट्रियों में
कांच की चूड़ियां बनाने वाली भट्टियों के पास
नालियों से कचरा निकालने के लिए,
सेप्टिक टैंक की ,सीवर लाईनों की सफाई के लिए,
और भी ऐसे न जाने कितने काम करने के लिए
जब मजदूर या कामगार नहीं मिलते।
इनकी मृत्यु से
क्या अंतर पड़ता है किसी को ,जब
चींटियों की तरह क़तार लगाकर
ढेर सारे ऐसे लोग आ जायेंगे वो
खाली जगहें भरने के लिए।