आभास एक छाया का

सूने पथों पर


एक आभासी छाया

जैसे हो सम्मुख मेरे

कह रहा हूं उससे मैं

अनकहे भेद अंतर के

वो अनकही कथाएं

जो अब तक

नहीं किसी को सुनाईं


लगा मुझे न जाने ऐसा क्यों

सुन रही है वह संपूर्ण ध्यान से

देख रही है जैसे मुझे अपलक

देख रहा हूं मैं भी उसे एकटक

भाव हमारे कुछ व्यक्त कुछ अव्यक्त

एक मार्ग सा बन गया है

उसके हृदय से मेरे हृदय तक


जगा मन में

एक संदेह मिश्रित आश्चर्य

छाया है भ्रम मेरा

या है कोई सत्य

जागा कौतूहल परखने का

जगी चाह स्पर्श की

छूने को मैं जब बढ़ा

हट गई छाया पीछे यह कहकर

वह सत्य है तब तक ही

जब तक है मध्य दूरियां

सामीप्य इससे अधिक उसे स्वीकार नहीं

कहां उसने स्मित हास जाते-जाते

स्पर्श की चाह ,

तुम्हारी कल्पना हो सकता है

पर अधिकार नहीं

इस

से अधिक सामीप्य

उसे स्वीकार नहीं