उधार की रोशनी में चमकता रहा चांद
सूरज चुपचाप नेपथ्य में जलता रहा।
चांद और चांद की झूठी चांदनी की शान में
लोग पढ़ते रहे कसीदे
सूरज अपना दर्द लिए उबलता रहा।
हकीकत से सारी दुनिया है वाकिफ़ कि
चांद के पास अपनी कोई रोशनी नहीं
चंद्र किरणें कहता जिसको जग सारा
वो रश्मियां सूर्य की हैं,
मगर कवियों की कोरी भावुकताओं के भरोसे
ये खेल सदियों से चलता रहा।
किसी और की रोशनी से
कोई उम्र भर पलता रहा
कोई कुछ कर न सका
बस मिटता रहा ,जलता रहा।