कहां तुम यहां की बाद-ए- सबा में खुश्बू ढूंढ़ते हो

वही है बाद-ए-सबा ऐ दिल मगर ये कूए यार नहीं है


जबसे उनसे होने लगी रोज़-रोज़ मुलाका़तें,

अब वो पहले जैसा लुत्फ़-ए- इंतिजा़र नहीं है


जानता हूं कि मुझे खारों के साथ करना है निबाह

मेरी जुस्तजू में कहीं कोई बहार नहीं है


मुझे अब न अपनों से शिकवा कोई ,न गैरों से गिला

किसी के लिए मेरे दिल में अब कोई गुबार नहीं है