कई बार हम देखते हैं

अपने चारों ओर

बहुत कुछ ढहते हुए

बहुत कुछ गिरते हुए।


हम चाहते हैं कि

जो ढह रहा है

वो न ढहे,

जो गिर रहा है

वो न गिरे।


हम कई बार

अपना प्रयत्न भी करते हैं

जो ढह रहा है

उसे रोकने के लिए

जो गिर रहा है

उसे बचाने के लिए।


पर एक अकेले के लिए

संभव नहीं होता

इतना सब कुछ कर पाना।


हम असहाय होकर

देखते रह जाते हैं

बहुत कुछ ढहना, गिरना।


थक हार कर

हम कहते हैं कि

हम कम से कम

अपने को ढहने से

अपने को

गिरने से बचा लें

यही बहुत है।