बाबू जी मौन हो गये हैं
सदा के लिए चिर निद्रा में सो गये हैं
अब न कभी वापस आयेगें
क्या आज उन्हें याद करे
कहे उनकी भी कथा
कुछ है जीवन कथा में उनकी
जिसमें कुछ आकर्षण है
या मात्र संघर्षों की कथा है
बाबूजी ने खो दिया था
बचपन में ही मां को अपने
बड़े परिवार में उस नन्हे बच्चे को
उसकी बुआ ने गले लगाया
वही बस उसको दुलराती थीं
रखती थीं ध्यान उसका
प्यार से उनका माथा सहलाती थीं
कुछ दिन बाद क्रूर भाग्य ने
उनको भी छीन लिया
बाबूजी ने बताया था हमें कभी
थोड़ी नम आंखों और रूंधे गले से,
अपनी बुआ को याद करते हुए
बाबू जी को बचपन से ही
आंखों से कम दिखता था
चढ़ गया था उनकी आंखों पर
एक मोटा चश्मा
गई बुआ तो जैसे उनके जीवन से प्यार गया
बाबूजी के पिता थे मुख्तार
संयुक्त परिवार के मुखिया
पूरे गांव इलाके में सम्मानित
पर अपने बिन मां के बेटे के लिये
उनके पास कहां था समय, कहां था प्यार
रहा भी होगा तो जताने में भय था
मुखिया को पक्षपात नहीं करना होता
अपनों से अधिक रखना पड़ता था
ध्यान औरों का
बिन मां के बाबू जी डोलते रहते इधर उधर
लोगों ने कर दिया नामकरण ढेलई
(एक पत्थर का छोटा टुकड़ा जिसे लोग इधर से उधर पैरों से मारते रहते हैं या छोटे बच्चे पेड़ पर मारते हैं या खेलते रहते हैं)
ऐसे बचपन बीता बिन प्यार बिन दुलार
अकेले बाबूजी रहने लगे
अपने में सिमटे सकुचाये
अपने दुखों की पोटली
अपनी पीड़ाएं अपने मन में छुपाये
अपनी बात अपने ही मन में छुपाये
कह न पाते किसी से
क्योंकि मिलता नहीं था
सच्चा प्यार किसी से
शायद इसीलिए
नहीं कर पाते थे विश्वास किसी पर
बताया था एक बार कि
अपने पैसे भी रखते थे
बांसों के झुरमुट में
किसी बांस में छुपाकर
बाबू जी पढ़े लिखे अपनी मेहनत से
जितना कर सकते थे
फिर हो गये अध्यापक हिंदी के
एक स्कूल में
शादी हो गई अम्मा से
अम्मा बन गईं उनके जीवन का आधार
बन गई उनकी शक्ति
जैसे पूरा उनका संसार
पहली पर मिला होगा शायद
जीवन में उनको प्यार
बाबू जी हो गये मास्टर साहब
एक छोटे से शहर में
अपने गांव से तीस किमी दूर
रहने लगे एक पुराने खपरैल के पुश्तैनी मकान में
मकान चार कमरों का जिनको नाम दिया था
चारों दिशाओं के नाम पर
पूरब वाला कमरा पश्चिम वाला
उत्तर वाला दक्षिण वाला
एक बड़ा बैठका
पीछे एक बड़ा सा हाता
जिसमें उगाते थे कुछ हरी सब्जियां
आगे था एक नीम का बड़ा पेड़
और एक गड़ही
हां और घर में थी दीवार में बनी हुई
एक छोटी सी लकड़ी की बनी हुई आलमारी
बाबूजी रखते थे हमेशा ताला लगाकर उसमें
छुपाकर खोलते थे सबसे
ऐसा लगता था जैसे कोई खजाना
छुपाकर रखा हो
नाराज हो जाते थे जब अम्मा मजाक में
हमें तब वहां भेजतीं
जब बाबूजी वहां आलमारी खोलते रहते
हर साल बरसात आने से पहले ही
बढ़ने लगती थीं बाबूजी की चिंताएं
फिर बारिश में चूने लगेगा घर
करानी पड़ेगी फेरौटी (मरम्मत)
बुलाना पड़ेगा बहिरु मिस्तरी को
काम अच्छा करता है
पर पैसा बहुत मांगता है
पर बाबू जी को उसका काम ही
पसंद आता था
एक दिन ऐसा आया जब छोड़ना पड़ा
बाबूजी को वो घर
बाबूजी फूट फूट कर रोये
स्मृतियों के कितने तार थे उस घर से जुड़े
बसती थी जैसे आत्मा उनकी
बाबूजी जाते थे उसी रास्ते
देख रहे थे उस घर को धीरे धीरे
खंडहर होते
दुखी हो जाते. कहते उस घर को
फेरौटी की जरुरत है
पर कौन करायेगा किसको फिक्र है
हो ही गया आखिर वो घर खंडहर
बाबूजी रखते थे एक एक पैसे का हिसाब
अपनी छोटी छोटी कापियों में ,पुर्जियों मे तिथिवार
उनहोंनें जीवन भर पहना
सिर्फ बाटा के जूते या चप्पल
बाबूजी अक्सर एक कपड़े का
झोला लटकाये निकलते
जब भी जाते किसी काम से
हर शाम पैदल चलकर चौक तक जाते
पर सब्जी अपनी
संभारु की ही दुकान से लाते
बाबूजी बाल भी कटवाते बुद्धू नाई से
जब तक वो जिंदा थे बाद में
अपने मन पसंद बाम्बे हेयर ड्रेसर
सैलून वाले से ही कटवाते थे
बाबूजी हर नयी चीज को
इतना सहेज कर रख देते
की वो हो जाती थी पुरानी
लाख हमारे कहने पर भी बचते थे
उनके इस्तेमाल से
बाबूजी अपने पुराने कपड़े भी रखते थे संभालकर
जब कुछ चीथड़े हो चुके कपड़ों को
अम्मा फेंक देतीं चुपके से
तो नाराज हो जाते बाबूजी अम्मा से कई दिनों तक
बाबूजी जी रखते थे अपनी
चिंताएं अपने तक ही सीमित
कई बार पूछने पर देते
जबाब सिर्फ हां हूं में
जब कभी किसी बात से नाराज होते
तो कई दिनों तक मौन ओढ़ लेते
गांव से अक्सर लोग आते थे शहर
रहकर पढ़ने के लिये ,कोई परीक्षा देने
डॉक्टर को दिखाने
बाबूजी दबे रहते थे
हर समय जिम्मेदारियोंं के बोझ से
छोटी जगह, छोटा शहर
उनकी अपनी पहचान थी
लोग कहते मास्टर साहब
आज के जमाने में भी
कितने शरीफ है
जीवन चलता रहा बाबूजी उठाते रहे
अपनी जिम्मेदारियों का बोझ
फिर हुये उनके दो बेटे
बाबूजी ने अपने बेटों को
पढा़या लिखाया लायक बनाया
बच्चे पढ़ने लिखने में होशियार
सारा मुहल्ला ,जानने वाले
न जानने वाले करते
बाबू जी के भाग्य की.सराहना
कि उनकी अच्छाई और मेहनत का
फल है कि उनके दोनों
बेटे हो गये इंजीनियर
आश्चर्य होता लोगों को
कि कैसे उन्होंने उठाया दो बेटों की
पढ़ाई का बड़ा खर्चा
अपनी छोटी सी तनख्वाह में
हम भी कभी बाद में जब पूछते कभी कि
बाबूजी बताइये. हमारी इंजीनियरिंग की पढ़ाई का
खर्चा कैसे उठाया
किससे किससे कर्जा लिया
किसने आपकी मदद की
तो आदत के अनुसार
हंसकर टाल देते बाबूजी
एक घर बनाया उन्होंने
अपने लिए शहर से थोड़ा दूर
उस घर के कोने कोने से वाकिफ थे
चल लेते थे बंद आंखों से भी
गहरा लगाव था उनको इस घर से
और समय बीता लग गईं
समय के साथ बच्चों की भी
अच्छी नौकरियां लग गईं
हो गईं उनकी भी शादी
बस गये घर उनके
गांव हमारा शहर से बस था
थोड़ी ही दूर
बाबूजी को था अपने खेतों से इतना प्यार
जैसे उनमें बसते थे
उनके प्राण उनका संसार
रिटायरमेंट के बाद
समर्पित हो गया उनका सारा जीवन
जैसे इन खेतों के नाम
अपनी मिट्टी के नाम
बाबूजी जी हो गये जैसे समर्पित
दिन रात उनके दिमाग मे
घूमती रहती थी अपनी जमीन
अपना मकान
जैसे भूत की तरह
बाबूजी को
पकड़े रहती थीं कितनी ही चिंताएं
कही कोई जमीन न कब्जाये
कही कोई खेत की मेंड़ तोड़कर
मेरे खेत का कुछ हिस्सा
अपने में न मिलाये
मजे की बात कई बार बाबूजी खेती में
जितना पैसा लगाते थे
उससे कम का अनाज उगा पाते थे
पर उसमें भी खुश रहते थे
कहते थे लोग ये तो नहीं कहेंगें
की खेत परती(खाली) छूट गया
मास्टर साहब से खेतिया ना संभरत ह
(मास्टर साहब से खेती नहीं संभल रही है)
लोग उनका मजाक उड़ाते, कहते
का मास्टर साहब का जान देत हवा
(मास्टर साहब क्यो़ं जान दे रहे हैं)
जाता लड़िकन के यहां आराम करता
(जाइये लड़कों के यहां रहकर आराम कीजिये)
पर बाबूजी लगे रहते
इन सबसे बेपरवाह
अपनी ही धुन में
जाते हर साल बच्चों के भी पास
पहले खुश रहते जब तक छोटे थे नाती पोते
जब नाती पोते बड़े हो गये
तो ऊब जाते बाबू जी कुछ दिन ही रहकर
कहते अब जाना है
खेतवा खाली होई
बोआवै के पड़ी
(खेत खाली होगा बोआना पड़ेगा)
अधिया वाले यादव जी से
अनाज भी लेना है
फिर कुछ साल ऐसे ही बीत गये
बाबूजी की तबीयत खराब हुई जोर से
महीनों पड़े रहे बाबूजी अस्पताल में
जूझते रहे मृत्यु से
लटके रहे जीवन मरण के बीच में
फिर उन्होंने इच्छा जतायी
मुझे घर ले चलो
अस्पताल वाले बस ऐंठ रहे हैं पैसे
मुझमें अब जान बिल्कुल बाकी है ही नहीं
लाये गये बाबूजी घर
महीनो पकड़े रहे बिस्तर
अम्मा बनी हुई थी उनका सहारा
उनकी शक्ति लगातार
फिर बाबूजी की जिजीविषा रंग लायी
हुआ जैसे कोई चमत्कार
बाबूजी खाट से उठ खड़े हुये
करने लगे फिर से अपना सारा काम
जिसने भी देखा दंग रह गया
बस यही कहा
अम्मा की सेवा और बाबूजी की
जीने की इच्छा से हुआ है कमाल
बाबूजी की स्मृति शक्ति कमाल की थी
उन्हें याद रहती थीं सारी चीजें याद
मुंहजबानी ,जैसे पुरानी यादें
अपने एकाउंट नं और भी कितनी ही बातें
फिर बीच बीच में बाबूजी
खाट पकड़ते फिर उठ जाते
हुआ एक और पक्षाघात
फिर जो बाबूजी ने पकड़ी खाट
वापस उठ न पाये
आवाज भी ठीक नहीं निकलती थी
पर दिमाग था पूरी तरह सतर्क
समझते थे हर बात पर बोल नहीं पाते थे
आंखें मूंदे पड़े रहते पर
पहचान लेते सबको आवाज से
सब.लोग कहने और सोचने लगे
कि बाबूजी को मुक्ति मिल जाये
फिर एक दिन ऐसा आया
कि सचमुच बाबूजी मौन हो गये
लीन हो गये चिर निद्रा में
हमेशा हमेशा के लिये
अम्मा हो गईं अकेली
जब बाद मे हमनें खोले बाबूजी के बक्से
तो हमें मिली कितनी ही कापियां जिनमें लिखा हुआ था एक एक कर्जे का हिसाब
और लिया था किस लिए
तब हमें पता लगा कि कौन थे वो लोग
जिनसे ली थी बाबूजी ने मदद
हमारी पढ़ाई के लिए
बक्से मे थी हमारी सारी चिठ्ठियां जो हमनें
लिखीं थीं कालेज से बाबूजी के लिए
उन बक्सों मे हमें मिलीं