इक औरत घर की चारदीवारी में

सिमटी सिमटी सी

जाने कितने रुप बदलती है

सुबह से लेकर शाम तक

हर वक़्त काम में खटती रहती है

कितना कुछ खामोशी से सहती है

कई बार उभरता

दीवारों में घिरा खालीपन

तन का मन का जीवन का सूनापन

घिरी हुई सबसे पर एकाकी सी रहती है

औरों के जीवन का केंद्र

पर स्वयं विकेंद्रीकृत

धुरी बनी हुई सबकी

पर अपने ही जीवन का अर्थ

अपने ही अस्तित्व को तलाशती

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इक औरत घर के बाहर

ढूंढ़ती अपने लिए एक जगह

चाहती छूने नये आयाम

खोलने हैं उसको कितने ही बंद द्वार

जूझती हुई पूर्वाग्रहों से

पर है

निर्भय निर्द्वन्द निरमुक्त

आत्मविश्वास से भरी-भरी

सधे कदमों से चलती

अपनी अभिलाषाओं के पंख पर हो सवार

छूने चली अपने सपनों का आकाश