अम्मा
तुम्हारा जाना कितना अप्रत्याशित
अचानक बस कुछ दिनों के अंतराल पर
लगता है आखिरी संपर्क सूत्र सा टूट गया
पहले से ही जैसे जड़ों से बिछड़े भटकते हुए हमारा
क्रूर निर्मम 2020 का अंतिम आघात
पीड़ा ये नहीं कि तुम निकल गयी
अंतिम यात्रा पर
पीड़ा ये कि तुमसे से
एक आखिरी मुलाकात नहीं हुई
न तुम मुझे देख पाई
न मैं तुम्हें देख पाया
तुम्हारी भी एक अधूरी इच्छा रही मन में
मुझे भी ये कसक रहेगी ताउम्र
अब जब तुम नहीं हो तो
बस रह गया सोचना ऐसा करते तो
शायद ऐसा हो सकता था
या ऐसा हो जाता
रह जाती तुम कुछ और दिन
जी जाती कुछ और
तुमने बुलाया था एक दिन पहले ही
अस्पताल से मुझे
शायद मैं दो दिन पहले भी आ सकता था .
पर तुम्हारे साथ दस दिन रहने के चक्कर में
वो पल वो मुलाकात मैंने गंवा दी
सब यहां हैं अवाक तुम्हारे जाने से
कर दी तुम्हारी राख और अस्थियां
तुम्हारी इच्छानुसार प्रवाहित सरयू मेंं
वहीं जहां बाबूजी का
अंतिम संस्कार हुआ था
अब इस घर मेंं पहली बार
तुम्हारी और बाबूजी की अनुपस्थिति मेंं
दिन बिताते हुए
तुम्हारे अंतिम संस्कार की
सारी प्रक्रियाओं से गुजरते हुए
सोचता हूं मैं
इस साल जब मृत्यु की खबरें
महज एक आंकड़ा सा बन गई हैं .
कोई संवेदनशीलता जागती ही नहीं
जीवन की नश्वरता का
प्रकृति के सामने मानव लघुता का
आभास कराने वाला यह साल
अब जब अपने अवसान पर है
अपना शोक मनाया जाय
या औरों के बारे मेंं सोचा जाये
जैसी तुम्हारी आदत थी
अम्मा तुमने जिया जीवन सारा अपना
कितने संघर्षो के बावजूद
सम्पूर्ण गरिमा के साथ
पूरे स्वाभिमान से सर उठाकर
तुमने निभाई अपने सारे संबंध
सारे दायित्व सारी मर्यादाएं
सारे कर्तव्य सारी निष्ठाएं
औरों को रखा हमेशा स्वयं सेऊपर
तुमने अर्जित किया कितना सम्मान
कितनी प्रतिष्ठा
मुझे न कोई अब तक मिला
न मैंने सुना किसी के मुंह से
कुछ भी बुरा कभी तुम्हारे लिए
कौन नहीं चाहता
इस तरह जाना छोड़कर ये संसार
कि जो आये कभी संपर्क में
जो हों संगी साथी
जो रहे हों कभी जीवन यात्रा में सहयात्री
जिनका जीवन हो तुमने छुआ
बहा देंं दो आंसू
और कहें कि बहुत अच्छी थी जाने वाली या
कहें कि बहुत अच्छा थी जाने वाला
तुमने जिया अपना जीवन अपने दायरे में भरपूर तुम्हारी जीवन सफल
तुम्हारी मृत्यु है सफल
एक सामान्य जन
और भला चाह सकता है
कैसा जीवन और कैसी मृत्यु

