अक्षम्य हो जाती हैं
हमारी वो चुप्पियां
जो टूटती नहीं तब भी
जब कितना कुछ
मर रहा था, जल रहा था,
टूट रहा था, बिखर रहा था
जिसको बनाने में, सजाने में, समेटने में
सालों साल लगे थे ।
हमारी चुप्पियां टूटती तो
शायद बच जाता
बहुत कुछ जो उस समय
नहीं जला था, नहीं टूटा था,
नहीं बिखरा था, नहीं मरा था।