देखता था प्रतिबिंब अपना मैं कभी इस सुनहरे दर्पन में

अब देखता नहीं प्रतिबिंब अपना, इस चिटके-चिटके दर्पन में


कभी बसते थे इनमें सपने इंद्रधनुषी,टूटती नहीं थी आस

पर अब कोई स्वप्न जागते नहीं,कोई आस जगती नहीं सूने-सूने नयन में


कभी रहता था यह भरा-भरा,गूंजती थी यहां आवाज़ें कितनी

अब कोई नहीं रहता यहां इस सूने-सूने भवन में


किसे समय यहां, कौन झांकता है किसके अंतर में किसी ज्ञात कितनी कथाएं हैं भरी, इस रिक्त-रिक्त मन में


बीत गई उम्र कोरी, रह गई कथा अधूरी,पर शेष हैं अभी कुछ कोरे पृष्ठ

लिख सकते हैं अब भी कोई कथा,शेष जितना है उसी जीवन में


कितनी ही बार कहने का समय बीत गया,कह ना पाया जो था कहना

रह गया व्यस्त मैं,बस उपयुक्त शब्दों के ही चयन में


कितनी बार मैं गया छला, टूटा मेरा अटूट विश्वास

हर बार होती रही भूल मुझसे, लोगों के आकलन में