रोज़ ही तो होता है जुल्म मज़लूमों पर दुनिया की निगाहों के सामने
पर ज़ुबां किसी की खुलती नहीं कोई भरता आह नहीं।
सब रस्मों, रिवाजों, पाबंदियों को तोड़कर किया गया इश्क़
इक क़िस्म की बग़ावत है,इतना भी कोई संगीन गुनाह नहीं।
खिजां का मौसम भी इक मौसम है, हां मगर थोड़ा उदास सा
बहारों की आरजू है सबको,खिजां की किसी को चाह नहीं।
लबों के तबस्सुम पे न जाना, झांककर ज़रा देखना लोगों के दिल में
किसके दिल में कोई वीराना नहीं, कौन इस दुनिया में तबाह नहीं।
सब किसी न किसी तरह चल रहें हैं अपनी मंज़िलों की जानिब
ये दुनिया है, बिना चले तो ज़िन्दगी का निबाह नहीं।